‘Simon Go Back’ का नारा असल में किसने दिया था? लाला लाजपत राय के बलिदान की पूरी कहानी

Shivam Pal

अक्टूबर 28, 2026

1928 me Simon Go Back virodh pradarshan aur Simon Commission ka bahishkar

‘Simon Go Back’ का नारा असल में किसने दिया था? लाला लाजपत राय के बलिदान की पूरी कहानी

1928 me Simon Go Back virodh pradarshan aur Simon Commission ka bahishkar

जब मैंने पहली बार आधुनिक भारतीय इतिहास की प्रामाणिक पुस्तकों और अभिलेखागारों के दस्तावेज़ों का अध्ययन शुरू किया था, तब 1920 के दशक के राजनीतिक घटनाक्रम ने मुझे सबसे ज़्यादा आकर्षित किया। असहयोग आंदोलन के अचानक स्थगित होने के बाद पूरे देश में एक अजीब सा राजनीतिक सन्नाटा था। लेकिन 3 फरवरी 1928 को बॉम्बे के बंदरगाह पर गूंजे एक नारे—Simon go back—ने उस सन्नाटे को हमेशा के लिए तोड़ दिया।

अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे UPSC या State PCS) की तैयारी करने वाले साथी मुझसे पूछते हैं कि महज़ 7 ब्रिटिश सांसदों की एक समिति के भारत आने पर इतना बड़ा जन-विद्रोह क्यों हुआ?

मुख्य बिंदु (Key Highlights)विवरण और महत्वपूर्ण तथ्य
• घटना (Event)साइमन कमीशन का राष्ट्रव्यापी बहिष्कार (Nationwide Boycott)
• प्रसिद्ध नारा (Famous Slogan)Simon Go Back (साइमन वापस जाओ)
• नारे के वास्तविक रचयिता (Slogan Creator)युसुफ मेहरअली (Yusuf Meherally) — बॉम्बे यूथ लीग के संस्थापक
• कमीशन का गठन (Formation)नवंबर 1927 (ब्रिटिश सरकार द्वारा समय से 2 वर्ष पूर्व)
• कमीशन के अध्यक्ष (Chairman)सर जॉन साइमन (Sir John Simon)
• कुल सदस्य (Total Members)7 सदस्य (सभी ब्रिटिश सांसद, इसे ‘श्वेत आयोग’ / White Commission कहा गया)
• भारत आगमन (Arrival Date & Place)3 फरवरी 1928, बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) बंदरगाह
• विरोध का मुख्य कारण (Core Reason)आयोग में एक भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था
• लाहौर लाठीचार्ज (Lahore Incident)30 अक्टूबर 1928 — ब्रिटिश पुलिस द्वारा लाला लाजपत राय पर बर्बर लाठीचार्ज
• अमर बलिदान (Martyrdom)17 नवंबर 1928 — चोटों के कारण पंजाब केसरी लाला लाजपत राय का देहांत
• ऐतिहासिक कथन (Famous Quote)“मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी।”
• दूरगामी प्रभाव (Historical Impact)1. नेहरू रिपोर्ट (1928) तैयार हुई
2. क्रांतिकारियों द्वारा सांडर्स वध
3. कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज (1929) का ऐतिहासिक संकल्प

1. साइमन कमीशन क्या था और इसका गठन क्यों हुआ?

1919 में ब्रिटिश हुकूमत ने गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919 (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) लागू किया था। इस कानून में यह प्रावधान था कि लागू होने के 10 वर्ष बाद (यानी 1929 में) एक संवैधानिक आयोग का गठन किया जाएगा, जो यह जांचेगा कि भारत में द्वैध शासन (Dyarchy) कैसा काम कर रहा है और क्या भारतीय और अधिक प्रशासनिक अधिकारों के योग्य हैं।

लेकिन 1929 का इंतज़ार करने के बजाय ब्रिटिश सरकार ने नवंबर 1927 में ही ‘इंडियन स्टैट्यूटरी कमीशन’ का गठन कर दिया।

समय से पहले गठन का राजनीतिक कारण

ब्रिटेन में उस समय कंज़र्वेटिव पार्टी की सरकार थी और 1929 में आम चुनाव होने वाले थे। कंज़र्वेटिव पार्टी को डर था कि अगर लेबर पार्टी चुनाव जीत गई, तो वह भारतीयों को अधिक रियायतें दे सकती है। इसलिए उन्होंने लॉर्ड बर्केनहेड (तत्कालीन भारत सचिव) की देखरेख में सर जॉन साइमन के नेतृत्व में समय से दो साल पहले ही यह कमीशन बना दिया।

विवरणतथ्य
आयोग का आधिकारिक नामइंडियन स्टैट्यूटरी कमीशन (Indian Statutory Commission)
अध्यक्षसर जॉन साइमन (लिबरल पार्टी)
सदस्यों की संख्या7 (सभी ब्रिटिश सांसद)
भारत आगमन की तारीख3 फरवरी 1928 (बॉम्बे)
मुख्य ब्रिटिश उद्देश्य1919 के अधिनियम की समीक्षा और संवैधानिक सुधार

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2. ‘Simon Go Back’ विरोध के मुख्य ऐतिहासिक कारण

Lahore me (simon go back) Simon Commission ke khilaf lathicharge me ghayal Lala Lajpat Rai

जब साइमन कमीशन के सदस्यों की सूची सार्वजनिक हुई, तो पूरे देश में आक्रोश फैल गया। इसे ‘व्हाइट कमीशन’ (श्वेत आयोग) कहा गया। विरोध के प्राथमिक कारण निम्नलिखित थे:

  1. एक भी भारतीय सदस्य का न होना: भारत का संविधान और भविष्य तय करने वाली 7 सदस्यों की कमेटी में एक भी भारतीय नहीं था। भारतीयों ने इसे अपने आत्मसम्मान और संप्रभुता पर सीधा हमला माना।
  2. लॉर्ड बर्केनहेड का घमंड: भारत सचिव लॉर्ड बर्केनहेड ने भारतीयों को चुनौती दी थी कि वे विभिन्न जातियों और संप्रदायों में बंटे हैं, इसलिए वे खुद मिलकर एक सर्वमान्य संविधान कभी नहीं बना सकते।
  3. स्वशासन की उपेक्षा: 1920 के दशक तक भारतीय जनमानस केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि स्वशासन की मांग कर रहा था।

जब आयोग के सदस्य 3 फरवरी 1928 को बॉम्बे बंदरगाह पर उतरे, तो उनका स्वागत काले झंडों, बंद दुकानों और Simon go back के गगनभेदी नारों से हुआ।

3. यह नारा वास्तव में किसने दिया था? (एक ज़रूरी ऐतिहासिक तथ्य)

इतिहास की सामान्य किताबों में अक्सर यह मान लिया जाता है कि Simon go back का नारा लाला लाजपत राय ने दिया था। लेकिन जब आप आधुनिक भारत के प्रामाणिक संदर्भों को खंगालेंगे, तो सच्चाई कुछ और सामने आती है।

  • यह नारा बॉम्बे के तत्कालीन युवा स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता युसुफ मेहरअली (Yusuf Meherally) द्वारा गढ़ा गया था।
  • युसुf मेहरअली बॉम्बे यूथ लीग के संस्थापक थे। उन्होंने आयोग के आगमन पर विरोध दर्ज कराने के लिए इस सीधे और प्रभावशाली वाक्य की रचना की थी।
  • दिलचस्प बात यह है कि आगे चलकर 1942 में महात्मा गांधी को “Quit India” (भारत छोड़ो) का नारा भी युसुफ मेहरअली ने ही सुझाया था।

4. लाला लाजपत राय का बलिदान और लाहौर की घटना

साइमन कमीशन भारत के विभिन्न शहरों—कलकत्ता, दिल्ली, पटना, मद्रास और लाहौर—के दौरे पर गया। हर जगह इसका व्यापक विरोध हुआ, लेकिन सबसे दुखद और निर्णायक मोड़ लाहौर में आया।

30 अक्टूबर 1928 का घटनाक्रम

लाहौर रेलवे स्टेशन पर लाला लाजपत राय और मौलाना ज़फ़र अली के नेतृत्व में एक विशाल शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था। हज़ारों की भीड़ काले झंडे लहराते हुए Simon go back के नारे लगा रही थी।

ब्रिटिश पुलिस अधीक्षक जेम्स ए. स्कॉट ने इस शांतिपूर्ण भीड़ पर लाठीचार्ज का आदेश दिया। पुलिस उपाधीक्षक जे.पी. सांडर्स और पुलिसकर्मियों ने लाला लाजपत राय की छाती और सिर पर बेरहमी से लाठियां बरसाईं।

गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उसी शाम एक विशाल जनसभा में लाला लाजपत राय ने वे अमर शब्द कहे:

“मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी।”

इस बर्बर लाठीचार्ज की चोटों के कारण 17 नवंबर 1928 को ‘पंजाब केसरी’ लाला लाजपत राय का देहांत हो गया।

5. भारतीय राजनीति और स्वतंत्रता संग्राम पर दूरगामी प्रभाव

लालाजी की शहादत और साइमन कमीशन के विरोध ने भारतीय राजनीति को दो बड़े मोर्चों पर बदल दिया:

क. क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरुत्थान

लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लेने के लिए ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) के भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और चंद्रशेखर आज़ाद ने स्कॉट को मारने की योजना बनाई। हालांकि, पहचान की गलती के कारण 17 दिसंबर 1928 को सांडर्स मारा गया। इसने देश के युवाओं में ब्रिटिश शासन के खिलाफ सीधी बगावत की चिंगारी सुलगा दी।

ख. नेहरू रिपोर्ट और पूर्ण स्वराज की ओर कदम

लॉर्ड बर्केनहेड की चुनौती को स्वीकार करते हुए भारतीय नेताओं ने फरवरी-मई 1928 में सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया। पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई जिसने अपनी प्रसिद्ध नेहरू रिपोर्ट (1928) पेश की। यह भारतीयों द्वारा अपना संविधान खुद तैयार करने का पहला व्यवस्थित प्रयास था।

जब ब्रिटिश सरकार ने नेहरू रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया, तो 1929 के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज को अपना एकमात्र लक्ष्य घोषित कर दिया।

6. प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC/PCS) के लिए महत्वपूर्ण अध्ययन बिंदु

मेरे व्यक्तिगत नोट्स के आधार पर, इस विषय से प्रारंभिक और मुख्य परीक्षाओं में अक्सर ये प्रश्न पूछे जाते हैं:

  1. कमीशन का समर्थन किसने किया था?
    • जहाँ कांग्रेस, मुस्लिम लीग (जिन्ना गुट), और हिंदू महासभा ने इसका बहिष्कार किया, वहीं डॉ. बी.आर. अंबेडकर की बहिष्कृत हितकारिणी सभा, मद्रास की जस्टिस पार्टी, और पंजाब की यूनियनिस्ट पार्टी ने साइमन कमीशन के सामने अपनी मांगें रखने का निर्णय लिया था ताकि वे वंचित वर्गों के अधिकारों की बात रख सकें।
  2. कमीशन की रिपोर्ट कब आई?
    • मई 1930 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें द्वैध शासन को समाप्त करने और प्रांतीय स्वायत्तता देने की सिफारिश की गई थी।
  3. गोलमेज सम्मेलन का आधार:
    • इसी साइमन रिपोर्ट पर चर्चा करने के लिए लंदन में 1930 से 1932 के बीच तीन गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conferences) आयोजित किए गए, जिसका अंतिम परिणाम भारत सरकार अधिनियम 1935 बना।

त्वरित सारांश (Quick Key Takeaways):

  • अखिल भारतीय जन-आक्रोश: भारत के भविष्य का फैसला करने के लिए गठित 7 सदस्यीय आयोग में एक भी भारतीय सदस्य न होना भारतीयों के स्वाभिमान को गहरी चोट थी, जिसके कारण देश भर में काले झंडे दिखाकर Simon Go Back का विरोध हुआ।
  • नारे की ऐतिहासिक सच्चाई: इतिहास में प्रसिद्ध यह नारा लाला लाजपत राय ने नहीं, बल्कि मुंबई के तत्कालीन युवा स्वतंत्रता सेनानी युसुफ मेहरअली ने तैयार किया था, जिन्होंने आगे चलकर 1942 में “Quit India” का नारा भी दिया।
  • स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक मोड़: लाहौर में लाला लाजपत राय पर हुए जानलेवा लाठीचार्ज और उनकी शहादत ने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को सीधा सक्रिय किया, और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को डोमिनियन स्टेटस छोड़कर पूर्ण स्वराज (1929) की मांग पर अडिग कर दिया।

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