
साइमन कमीशन (Simon Commission) का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का वह महत्वपूर्ण मोड़ है, जिसने कागज़ी प्रशासनिक बदलाव से निकलकर पूरे देश की दिशा बदल दी।
3 फरवरी 1928 की सुबह बॉम्बे (मुंबई) बंदरगाह पर जब सात अंग्रेज़ अधिकारियों का एक दल उतरा, तो उन्हें शायद अंदाज़ा भी नहीं था कि उनका यह दौरा ब्रिटिश हुकूमत के ताबूत में आखिरी कीलें ठोकने की शुरुआत साबित होगा।
पूरा शहर काले झंडों, बंद दुकानों और एक गूंजते हुए नारे से पटा हुआ था — “Simon Go Back!” (साइमन वापस जाओ)।
लेकिन ऐसा क्या था इस 7 सदस्यीय दल में, जिसने कांग्रेस, मुस्लिम लीग, क्रांतिकारियों और आम जनता—सबको एक साथ सड़क पर ला खड़ा किया? आइए, इतिहास के पन्नों को पलटते हुए समझते हैं साइमन कमीशन की पूरी इनसाइड स्टोरी।
1. क्विक स्नैपशॉट: 60 सेकंड में Simon Commission
यदि आप किसी प्रतियोगी परीक्षा (UPSC, State PCS) की तैयारी कर रहे हैं या त्वरित जानकारी चाहते हैं, तो यह संक्षिप्त चार्ट आपके काम आएगा:
| मुख्य पहलू | ऐतिहासिक विवरण |
| आधिकारिक नाम | इंडियन स्टेट्यूटरी कमीशन (Indian Statutory Commission) |
| गठन की तिथि | 8 नवंबर 1927 |
| भारत आगमन | 3 फरवरी 1928 (बॉम्बे) |
| कुल सदस्य | 7 (सभी ब्रिटिश सांसद — इसे ‘श्वेत कमीशन’ कहा गया) |
| अध्यक्ष | सर जॉन साइमन (ब्रिटिश लिबरल पार्टी) |
| उद्देश्य | 1919 के मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की 10-वर्षीय समीक्षा |
| प्रसिद्ध नारा | “Simon Go Back” (यूसुफ मेहरअली द्वारा गढ़ा गया) |
| रिपोर्ट प्रस्तुति | मई 1930 |
2. पृष्ठभूमि: समय से 2 साल पहले क्यों भेजा गया Simon Commission?
गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919 में यह स्पष्ट प्रावधान था कि इस अधिनियम के 10 साल बाद (यानी 1929 में) एक आयोग बनाया जाएगा, जो यह जांचेगा कि भारत में प्रशासनिक व्यवस्था कैसे चल रही है और क्या भारतीयों को और संवैधानिक अधिकार दिए जाने चाहिए।
लेकिन Simon Commission का गठन 1927 में (दो साल पहले) ही क्यों कर दिया गया? (ब्रिटिश भारतीय संवैधानिक इतिहास (Britannica))
इसके पीछे ब्रिटिश संसद की आंतरिक राजनीति थी:
- लेबर पार्टी के आने का भय: ब्रिटेन की तत्कालीन सत्तारूढ़ कंजर्वेटिव पार्टी को डर था कि 1929 के आम चुनावों में लेबर पार्टी (जो भारतीयों के प्रति थोड़ी नरम मानी जाती थी) सत्ता में आ सकती है।
- नियंत्रण बनाए रखने की मंशा: वे चाहते थे कि भारत के भविष्य के संवैधानिक सुधारों का खाका कंजर्वेटिव नीतियों के अनुसार ही तैयार हो। इसलिए प्रधानमंत्री स्टेनली बाल्डविन ने समय से पहले ही सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में इस आयोग का गठन कर दिया।
3. भारतीयों के आत्मसम्मान पर सीधा प्रहार
जब हम इतिहास को केवल तारीखों के रूप में रटते हैं, तो असल दर्द समझ नहीं आता।
एक विचारणीय प्रश्न: कल्पना कीजिए कि आपके अपने घर का बजट, नियम और भविष्य तय करने के लिए 7 लोगों की एक कमेटी बना दी जाए, और उस कमेटी में आपके परिवार के किसी भी सदस्य को शामिल न किया जाए! क्या यह आपके आत्मसम्मान का खुला अपमान नहीं होगा?
यही भावना उस समय हर भारतीय के दिल में थी।
30 करोड़ की आबादी वाले देश के शासन की समीक्षा के लिए गठित आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। सातों सदस्य ब्रिटिश सांसद थे। इसीलिए इसे देश भर में ‘श्वेत कमीशन’ (White Commission) कहकर पुकारा गया। लॉर्ड बर्कनहेड (तत्कालीन भारत सचिव) का अहंकार यह था कि “भारतीय अपने लिए सर्वमान्य संविधान बनाने में सक्षम ही नहीं हैं।”
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4. ‘Simon Go Back’ और देशव्यापी विरोध की लहर
जैसे ही 3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन (Simon Commission) बॉम्बे पहुंचा, देश भर में अभूतपूर्व हड़तालें हुईं।
- काले झंडे और पोस्टर्स: देश के जिस शहर में भी कमीशन गया—चाहे कलकत्ता हो, दिल्ली, मद्रास या लखनऊ—उनका स्वागत काले झंडों और नारों के साथ हुआ।
- लखनऊ में नवाबी विरोध: जब साइमन और उनके सहयोगी लखनऊ पहुंचे, तो जवाहरलाल नेहरू और गोविंद वल्लभ पंत के नेतृत्व में विरोध हुआ, जहां पुलिस ने बर्बरता से लाठियां बरसाईं।
- लाहौर की वह दुखद घटना: 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर रेलवे स्टेशन पर लाला लाजपत राय के नेतृत्व में शांतिपूर्ण प्रदर्शन चल रहा था। पुलिस अधीक्षक जेम्स ए. स्कॉट के आदेश पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। गंभीर रूप से घायल लाला जी ने उसी शाम ऐतिहासिक शब्द कहे:
“मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की अंतिम कील साबित होगी।”
17 नवंबर 1928 को लाला जी का देहांत हो गया, जिससे पूरे देश में रोष की ज्वाला भड़क उठी।
5. राजनीतिक दलों का रुख: किसने विरोध किया और किसने सहयोग?
प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से यह जानना बेहद महत्वपूर्ण है कि सभी दलों का रुख एक जैसा नहीं था:
पूर्ण बहिष्कार करने वाले दल:
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: 1927 के मद्रास अधिवेशन में डॉ. एम.ए. अंसारी की अध्यक्षता में Simon Commission के पूर्ण बहिष्कार का निर्णय लिया गया।
- मुस्लिम लीग (जिन्ना गुट): मोहम्मद अली जिन्ना ने साफ कहा कि बिना भारतीयों के प्रतिनिधित्व वाला कमीशन अमान्य है।
- हिंदू महासभा व लिबरल फेडरेशन: तेज बहादुर सप्रू ने भी भारतीयों की उपेक्षा का कड़ा विरोध किया।
सहयोग व ज्ञापन सौंपने वाले दल:
- मुस्लिम लीग (शफ़ी गुट): पंजाब के मियां मोहम्मद शफ़ी के नेतृत्व वाले धड़े ने कमीशन से बातचीत की।
- मद्रास की जस्टिस पार्टी: गैर-ब्राह्मण हितों और आरक्षण की बात रखने के लिए सहयोग किया।
- पंजाब यूनियनिस्ट पार्टी: सर छोटू राम और फजली हुसैन के नेतृत्व में जमींदारों व किसानों के पक्ष के लिए मिले।
- ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज एसोसिएशन: डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने दलितों और शोषित वर्गों के राजनीतिक अधिकारों, शिक्षा और मताधिकार के लिए आयोग के सामने सशक्त ज्ञापन प्रस्तुत किया।
6. साइमन कमीशन (Simon Commission) की प्रमुख सिफारिशें (Key Recommendations)
मई 1930 में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में आयोग ने निम्नलिखित मुख्य सिफारिशें रखीं:
- द्वैध शासन (Dyarchy) का अंत: प्रांतों में 1919 के तहत चल रही द्वैध शासन प्रणाली को खत्म कर ‘प्रांतीय स्वायत्तता’ (Provincial Autonomy) दी जाए।
- केंद्र में कोई ढील नहीं: केंद्र में गवर्नर-जनरल और उनकी काउंसिल के विशेषाधिकार व वीटो पावर यथावत बनी रहे।
- अखिल भारतीय संघ: ब्रिटिश प्रांतों और देशी रियासतों को मिलाकर एक फेडरेशन बनाया जाए।
- सांप्रदायिक निर्वाचन जारी रहे: सांप्रदायिक तनावों का हवाला देते हुए अलग निर्वाचक मंडलों को जारी रखने की बात कही गई।
- सीमाओं का पुनर्गठन: सिंध को बॉम्बे से अलग करने और बर्मा (म्यांमार) को भारत से पूरी तरह अलग करने की सिफारिश की गई।
7. साइमन कमीशन (Simon Commission) के 4 बड़े दूरगामी परिणाम (Long-term Impact)
साइमन कमीशन (Simon Commission) भले ही भारत में असफल और तिरस्कृत रहा, लेकिन इसने स्वतंत्रता आंदोलन को 4 बड़े मोड़ दिए:
नेहरू रिपोर्ट (1928): अंग्रेजों के घमंड को भारतीयों का करारा जवाब
जब भारतीयों ने साइमन कमीशन का विरोध किया, तो ब्रिटिश भारत सचिव लॉर्ड बर्कनहेड ने भारतीयों को यह कहकर चुनौती दी कि “भारतीय ऐसा संविधान बना ही नहीं सकते जो सभी वर्गों को मान्य हो।”
इस चुनौती को स्वीकार करते हुए कांग्रेस ने फरवरी 1928 में एक सर्वदलीय सम्मेलन (All Parties Conference) बुलाया और पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई। इस कमेटी द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट को ‘नेहरू रिपोर्ट’ कहा गया, जो भारतीयों द्वारा अपने संविधान निर्माण का पहला ऐतिहासिक प्रयास था।
- मुख्य मांगें व सिफारिशें:
- डोमिनियन स्टेटस: भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासित राज्य (Dominion Status) का दर्जा।
- मौलिक अधिकार: नागरिकों के लिए 19 मौलिक अधिकार, जिनमें धर्म की स्वतंत्रता और पुरुषों व महिलाओं के लिए समान अधिकार शामिल थे।
- वयस्क मताधिकार: संपत्ति या टैक्स के आधार के बजाय सभी वयस्क नागरिकों को वोट देने का अधिकार।
- सांप्रदायिक निर्वाचन की समाप्ति: अलग निर्वाचक मंडलों (Separate Electorate) की जगह अल्पसंख्यकों के लिए केवल सीटों के आरक्षण की व्यवस्था।
- नेहरू रिपोर्ट (1928): लॉर्ड बर्कनहेड की चुनौती को स्वीकारते हुए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में सर्वदलीय समिति ने भारत के संविधान का पहला मसौदा पेश किया।
- क्रांतिकारी आंदोलन में उबाल: लाला लाजपत राय की शहादत का बदला लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव ने लाहौर में जॉन सॉन्डर्स को मौत के घाट उतार दिया।
- पूर्ण स्वराज और सविनय अवज्ञा (1930): ब्रिटिश उदासीनता के विरोध में 1929 के लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ का संकल्प लिया गया और महात्मा गांधी के नेतृत्व में दांडी मार्च/सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ।
- भारत सरकार अधिनियम 1935: साइमन कमीशन की रिपोर्ट पर ही चर्चा के लिए लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलन (1930–32) हुए, जिसने अंततः 1935 के ऐतिहासिक अधिनियम का ढांचा तैयार किया।
8. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
‘Simon Go Back’ का नारा सबसे पहले किसने दिया था?
यह नारा स्वतंत्रता सेनानी और बॉम्बे के पूर्व मेयर यूसुफ मेहरअली ने गढ़ा था। (उन्होंने ही बाद में 1942 में “भारत छोड़ो” / “Quit India” का नारा भी दिया था)।
साइमन कमीशन (Simon Commission) में कितने भारतीय सदस्य थे?
साइमन कमीशन (Simon Commission) में कुल 7 सदस्य थे और सभी ब्रिटिश संसद के सदस्य (श्वेत) थे। इसमें शून्य (0) भारतीय सदस्य थे।
साइमन कमीशन (Simon Commission) के समय भारत का वायसराय कौन था?
उस समय भारत का वायसराय लॉर्ड इरविन (1926–1931) था।
क्लेमेंट एटली का साइमन कमीशन (Simon Commission) से क्या संबंध था?
क्लेमेंट एटली साइमन कमीशन (Simon Commission) के 7 सदस्यों में से एक थे। बाद में वे 1945 से 1951 तक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे और उन्हीं के कार्यकाल में 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली।
निष्कर्ष (Final Takeaway)
साइमन कमीशन ब्रिटिश हुकूमत की एक ऐसी कूटनीतिक चूक थी जिसने बिखरे हुए भारत को आत्मसम्मान के धागे में पिरो दिया। कागज़ पर लिखा एक गलत फैसला कैसे सड़कों पर जनक्रांति बन जाता है, साइमन कमीशन का इतिहास इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer & Sources):
यह लेख केवल शैक्षणिक एवं प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC, State PCS, SSC) की सामान्य जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत ऐतिहासिक तथ्य, तिथियां और विवरण NCERT (Modern Indian History), ‘भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’ (बिपिन चंद्र) और आधिकारिक ऐतिहासिक अभिलेखों पर आधारित हैं। पाठक किसी भी अंतिम संदर्भ के लिए प्रामाणिक सरकारी गजट या मानक इतिहास संदर्भ पुस्तकों का अध्ययन कर सकते हैं।
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