
1942 का ‘Secret Radio’: “1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, तब उषा मेहता कांग्रेस रेडियो 1942 (Congress Radio) के माध्यम से देश भर में क्रांति की गुप्त आवाज़ बनकर उभरीं।”
ऐसे अंधेरे दौर में, 27 अगस्त 1942 की शाम को अचानक बॉम्बे (मुंबई) के एक गुप्त रेडियो फ्रीक्वेंसी पर एक दमदार आवाज़ गूंजी:
“यह कांग्रेस Secret Radio है, जो 42.34 मीटर की वेवलेंथ से भारत में किसी अज्ञात स्थान से प्रसारित हो रहा है…”
यह आवाज़ थी 22 साल की कानून की छात्रा उषा मेहता की।
अंग्रेजों की सेंसरशिप और ‘कांग्रेस Secret radio’ का जन्म
9 अगस्त 1942 को जब ब्रिटिश सरकार ने भारतीय प्रेस पर सख्त प्रतिबंध लगा दिए, तब आंदोलनकारी नेताओं को लगा कि जनता तक क्रांति की खबरें पहुंचाना बेहद ज़रूरी है।
इस असंभव काम को मुमकिन बनाया उषा मेहता, विट्ठलभाई झावेरी, चंद्रकांत झावेरी और टेक्नीशियन नररीमन प्रिंटर ने। नररीमन के पास पहले से एक ट्रांसमीटर का लाइसेंस था, जिसे उन्होंने गुप्त रूप से मॉडिफाई करके एक शक्तिशाली शॉर्ट-वेव ट्रांसमीटर में बदल दिया।
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रेडियो स्टेशन चलाने की गुप्त रणनीति
- स्थान का लगातार बदलाव: अंग्रेज खुफिया एजेंसियां (Special Branch) रेडियो सिग्नल को ट्रेस न कर सकें, इसके लिए रेडियो स्टेशन को हर 2-3 दिन में एक गुप्त घर से दूसरे घर शिफ्ट किया जाता था।
- रिकॉर्डिंग और ट्रांसमिशन: दिन के समय भाषणों और संदेशों को रिकॉर्ड किया जाता था और देर रात या सुबह-सुबह 42.34 मीटर फ्रीक्वेंसी पर ब्रॉडकास्ट किया जाता था।
- अंग्रेजी और हिंदी में समाचार: उषा मेहता हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में समाचार बुलेटिन पढ़ती थीं।
डॉ. राममनोहर लोहिया और आज़ादी के भाषण
इस गुप्त रेडियो स्टेशन के मुख्य बौद्धिक मार्गदर्शक थे डॉ. राममनोहर लोहिया। वे अक्सर भेष बदलकर गुप्त ठिकानों पर आते थे और रेडियो के ज़रिए देश की जनता को संबोधित करते थे।
कांग्रेस रेडियो के ज़रिए जनता को ये मुख्य जानकारियां दी जाती थीं:
- अंग्रेजों द्वारा देश भर में किए जा रहे लाठीचार्ज और अत्याचारों की सच्ची खबरें।
- चिमूर और असफ़ी में हुए ब्रिटिश नरसंहार के छुपाए गए तथ्य।
- महात्मा गांधी का “करो या मरो” का संदेश।
- विभिन्न राज्यों में जारी हड़तालों और रेल रोको अभियानों की लाइव अपडेट्स।
“डॉ. राममनोहर लोहिया के मार्गदर्शन में उषा मेहता और कांग्रेस Secret Radio 1942 की टीम ने अंग्रेजों के जुल्मों की सच्ची दास्तान जनता तक पहुंचाई।”
अंग्रेजों की नाकामी और पुलिस का धावा
अंग्रेजी हुकमत और बॉम्बे पुलिस के पास ऐसे उच्च-स्तरीय डिटेक्टर उपकरण थे जो रेडियो सिग्नल की लोकेशन को ट्रैक कर सकते थे। इसके बावजूद लगभग 3 महीने (अगस्त से नवंबर 1942) तक पुलिस यह पता नहीं लगा पाई कि यह ‘अदृश्य आवाज़’ आ कहाँ से रही है।
12 नवंबर 1942: आख़िरी ब्रॉडकास्ट
12 नवंबर 1942 को एक तकनीशियन की गद्दारी के कारण पुलिस को गिरगाम स्थित ‘पारेख वाडी’ इमारत के गुप्त ठिकाने का पता चल गया। जब पुलिस ने दरवाज़ा तोड़ा, तब उषा मेहता और उनके साथी रेडियो पर ‘वंदे मातरम’ रिकॉर्ड कर रहे थे।
पुलिस के आने के बाद भी उषा मेहता ने गाना बंद नहीं किया और रिकॉर्डिंग पूरी की।
यरवदा जेल और कोर्ट में दृढ़ता
गिरफ्तारी के बाद उषा मेहता से महीनों तक कड़ी पूछताछ की गई। ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें विदेश जाकर पढ़ाई करने और भारी इनाम का लालच दिया, लेकिन उन्होंने अपने साथियों या रेडियो नेटवर्क के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला।
उन्हें 4 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई और पुणे की यरवदा जेल भेज दिया गया। 1946 में जब अंतरिम सरकार बनी, तब मोरारजी देसाई के आदेश पर उन्हें रिहा किया गया।
निष्कर्ष (Conclusion):
“भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उषा मेहता कांग्रेस रेडियो 1942 का यह गुप्त अभियान साहस, तकनीक और देशभक्ति की एक अद्वितीय मिसाल बना रहेगा।”
Disclaimer:
इस लेख में दी गई जानकारी ऐतिहासिक तथ्यों, प्रमाणिक स्रोतों और शैक्षिक उद्देश्यों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सामान्य ज्ञान और इतिहास से जुड़ी जानकारी साझा करना है। किसी भी ऐतिहासिक संदर्भ की आधिकारिक पुष्टि के लिए प्रामाणिक सरकारी अभिलेखों या ऐतिहासिक पुस्तकों का संदर्भ लें।
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