परिचय
“हरित क्रांति क्या है (Harit Kranti Kya Hai)” — इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले यह समझना आवश्यक है कि कृषि-उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के संदर्भ में भारत किस प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा था। आज हम जिस हरित क्रांति की बात कर रहे हैं, वह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि कृषि प्रौद्योगिकी, बीज, उर्वरक, सिंचाई एवं किसानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में व्यापक परिवर्तन का प्रतीक है।

भारत आज-कल खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इसके पीछे एक अहम मील पतर था: हरित क्रांति। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि हरित क्रांति क्या है, इसके उद्देश्य क्या थे, इसे भारत में क्यों और कैसे अपनाया गया, इसके प्रभाव क्या रहे और आज के परिप्रेक्ष्य में इसे हम कैसे देख सकते हैं।
हरित क्रांति क्या है (Harit Kranti Kya Hai)
शब्द- “हरित” का अर्थ हरा, कृषि-केन्द्रित क्षेत्र से जुड़ा, और “क्रांति” का अर्थ व्यापक परिवर्तन है। इसलिए, जब हम पूछते हैं “हरित क्रांति क्या है”, तो हम उस कृषि-क्षेत्र में ऐसे तीव्र, मूलभूत परिवर्तन की ओर संकेत कर रहे हैं जिसमें सिर्फ उपज नहीं बढ़ी बल्कि कृषि पद्धति, बीज, कृषि विज्ञान, सिंचाई, मशीनरी और किसानों का सामाजिक-आर्थिक स्वरूप बदल गया।
विशेष रूप से, यह परिवर्तन उस समय हुआ जब भारत में खाद्यधान्य-उत्पादन की कमी और बढ़ती जनसंख्या ने एक गंभीर संकट का रूप ले लिया था। इस आवश्यकता ने कृषि-प्रौद्योगिकी को अपनाने के लिए प्रेरित किया, जिसे हरित क्रांति कहा गया।
भारत में हरित क्रांति का आरंभ
भारत में हरित क्रांति (Harit Kranti Kya Hai) का आरंभ 1960-के दशक में हुआ था। इसके पीछे कई कारण थे: खाद्यान्न की कमी, जनसंख्या की तीव्र वृद्धि, पारंपरिक कृषि पद्धतियों की सीमाएँ, तथा नई तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता। Drishti IAS
उदाहरण के लिए, 1943 के बंगाल अकाल तथा स्वतंत्रता के बाद खाद्य उत्पादन की निरंतर कमी ने स्थिति को और गंभीर किया। ऐसे में भारत सरकार ने उच्च उपज-दाने वाले बीज (HYV), अधिक सिंचाई एवं उर्वरक-कीटनाशक के प्रयोग को बढ़ावा दिया।
भारत में अक्सर यह कहा जाता है कि 1967-68 से शुरू हुई यह क्रांति ने भारत को “खाद्यान्न कमी वाले देश” की श्रेणी से निकाला और खाद्यान्न उत्पादक देश बना दिया।
हरित क्रांति के उद्देश्य
जब हम “हरित क्रांति क्या है” (Harit Kranti Kya Hai) के संदर्भ में उद्देश्य देखें, तो प्रमुखतः निम्न बिंदु उभरते हैं:
- तत्काल खाद्य-धान्य की कमी को दूर करना – भारत में भुखमरी और खाद्यान्न की कमी की समस्या ने इसे जरूरी बना दिया था।
- कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि – परम्परागत खेती में उत्पादन सीमित था; इसलिए उच्च उपज-दाने वाले बीज, उर्वरक, सिंचाई आदि से उत्पादकता बढ़ाना था।
- कृषि का आधुनिकीकरण एवं ग्रामीण विकास – खेत-यंत्रों, मशीनरी, वैज्ञानिक अनुसंधान, बेहतर बुनियादी ढाँचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) देना उद्देश्य था।
- खाद्यान्न आत्मनिर्भरता – भारत को खाद्य-आयात पर निर्भरता कम करनी थी।
- रोजगार एवं सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार – कृषि के माध्यम से गांवों में रोजगार देना तथा किसान-समुदाय की स्थिति सुधारना था।
इन उद्देश्यों से स्पष्ट है कि हरित क्रांति (Harit Kranti Kya Hai) सिर्फ कृषि-उत्पादन का विषय नहीं थी, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक न्याय, कृषि-प्रौद्योगिकी तथा राष्ट्र-भोजन सुरक्षा के बीच का एक समग्र परिवर्तन-प्रकल्प था।
हरित क्रांति के मूल तत्त्व
जब हम यह जानते हैं कि “हरित क्रांति क्या है”(Harit Kranti Kya Hai), तो यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि इसके पीछे किन-किन प्रमुख तकनीकी, सामाजिक और आर्थिक तत्त्वों ने काम किया।
- उच्च उपज-दाने वाले बीज (HYV) – ये बीज पारम्परिक किस्मों की तुलना में तेजी से वृद्धि करते थे और अधिक उपज देने में सक्षम थे।
- सिंचाई का विस्तार – विशेष रूप से स्थिर सिंचाई (नहरें, नलकूप) और बाद में ड्रिप/टपकन जैसी आधुनिक विधियाँ।
- रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक – पौधों के विकास को बढ़ावा देने और रोग-कीटों से बचाव के लिए।
- यंत्र-करण एवं कृषि-मशीनरी – ट्रैक्टर, हार्वेस्टर आदि का प्रयोग बढ़ा।
- दोहरी फसल प्रणाली – वर्ष में दो फसलें लेने की प्रवृत्ति।
- अनुसंधान एवं प्रसार – कृषि अनुसंधान एवं किसानों तक तकनीक पहुँचाना।
इन तत्त्वों ने मिलकर भारत की कृषि-तस्वीर को बदल दिया। इस बदलाव का सार यह है: “कम समय में, अधिक उत्पादन” — जो “हरित क्रांति क्या है” (Harit Kranti Kya Hai) के सवाल का एक सशक्त उत्तर भी है।
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भारत में हरित क्रांति की सफलता
जब “हरित क्रांति क्या है” (Harit Kranti Kya Hai) की बात करते हैं, तो इसके सफल परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत में इसने कई सकारात्मक प्रभाव छोड़े हैं:
- उदाहरण के लिए, भारत ने गेहूं और चावल दोनों में उत्पादन में भारी वृद्धि दर्ज की।
- भारत ने खाद्यान्न आयात पर निर्भरता कम की और खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा।
- कृषि उपज तथा उत्पादकता में वृद्धि हुई, किसानों की आय में सुधार हुआ।
- मशीनरी एवं कृषि-उपकरणों की मांग बढ़ी, जिससे कृषि-उद्योगों को भी बल मिला।
- ग्रामीण रोजगार के अवसर बढ़े क्योंकि खेती-पद्धति बदल गई थी।
उपरोक्त सभी पहलुओं को देखने पर यह स्पष्ट है कि “हरित क्रांति क्या है” (Harit Kranti Kya Hai) — यह न सिर्फ एक तकनीकी बदलाव है बल्कि एक सामाजिक-आर्थिक बदलाव भी है।
चुनौतियाँ एवं आलोचनाएँ
हरित क्रांति ने जितने फायदे दिए, उतनी ही चुनौतियाँ और आलोचनाएँ भी सामने आईं। यानी “हरित क्रांति क्या है” (Harit Kranti Kya Hai) के सवाल का जवाब जितना सकारात्मक है, उतना ही संतुलित दृष्टिकोण से देखना आवश्यक है।
कुछ प्रमुख चुनौतियाँ इस प्रकार हैं:
- क्षेत्रीय असमानता: इस क्रांति का लाभ मुख्यतः उन क्षेत्रों को मिला जो पहले से सिंचित एवं उन्नत थे। पूर्वी भारत, शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्र इससे कम प्रभावित हुए।
- सामाजिक-आर्थिक असमानता: बड़े किसानों को अधिक लाभ हुआ; छोटे और भूमिहीन किसानों को उतना लाभ नहीं मिला।
- पर्यावरणीय हानि: रसायनों का अत्यधिक उपयोग, भूमि का क्षरण, जैव विविधता पर प्रभाव आदि।
- विविध फसलों का अनियंत्रित विकास न होना: गैर-खाद्य फसलें, दलहन-तिलहन आदि को पर्याप्त नहीं अपनाया गया।
- संसाधनों का असंतुलित उपयोग: सिंचाई का दुष्प्रयोग, भूजल स्तर में गिरावट। (उल्लेखतः स्रोतों में प्रत्यक्ष नहीं, किन्तु आलोकित)
- पूँजी-गहन खेती: बड़े निवेश की आवश्यकता ने छोटे किसानों को पीछे छोड़ दिया।
इन बिंदुओं को देखते हुए स्पष्ट होता है कि हरित क्रांति जितनी “क्या है” की दृष्टि से महत्वपूर्ण थी, उतनी ही “क्या नहीं थी” या “क्या सही ढंग से नहीं हुई थी” की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण समीक्षा का विषय है।
चुनौतियाँ एवं आलोचनाएँ
हरित क्रांति ने जितने फायदे दिए, उतनी ही चुनौतियाँ और आलोचनाएँ भी सामने आईं। यानी “हरित क्रांति क्या है” (Harit Kranti Kya Hai) के सवाल का जवाब जितना सकारात्मक है, उतना ही संतुलित दृष्टिकोण से देखना आवश्यक है।
कुछ प्रमुख चुनौतियाँ इस प्रकार हैं:
- क्षेत्रीय असमानता: इस क्रांति का लाभ मुख्यतः उन क्षेत्रों को मिला जो पहले से सिंचित एवं उन्नत थे। पूर्वी भारत, शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्र इससे कम प्रभावित हुए।
- सामाजिक-आर्थिक असमानता: बड़े किसानों को अधिक लाभ हुआ; छोटे और भूमिहीन किसानों को उतना लाभ नहीं मिला।
- पर्यावरणीय हानि: रसायनों का अत्यधिक उपयोग, भूमि का क्षरण, जैव विविधता पर प्रभाव आदि।
- विविध फसलों का अनियंत्रित विकास न होना: गैर-खाद्य फसलें, दलहन-तिलहन आदि को पर्याप्त नहीं अपनाया गया।
- संसाधनों का असंतुलित उपयोग: सिंचाई का दुष्प्रयोग, भूजल स्तर में गिरावट। (उल्लेखतः स्रोतों में प्रत्यक्ष नहीं, किन्तु आलोकित)
- पूँजी-गहन खेती: बड़े निवेश की आवश्यकता ने छोटे किसानों को पीछे छोड़ दिया।
इन बिंदुओं को देखते हुए स्पष्ट होता है कि हरित क्रांति जितनी “क्या है” की दृष्टि से महत्वपूर्ण थी, उतनी ही “क्या नहीं थी” या “क्या सही ढंग से नहीं हुई थी” की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण समीक्षा का विषय है।
हरित क्रांति का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
जब हम “हरित क्रांति क्या है” (Harit Kranti Kya Hai) पर गहराई से विचार करते हैं, तो उसके सामाजिक-आर्थिक असर को समझना अत्यंत आवश्यक है।
सकारात्मक प्रभाव
- किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ, विशेष रूप से उन किसानों की जिनके पास पर्याप्त संसाधन थे।
- ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि-मशीनरी, संसाधन व बुनियादी ढाँचा विस्तारित हुआ।
- खाद्य-सुरक्षा का संकट कम हुआ और देश की खाद्यान्न उपलब्धता बेहतर हुई।
- महिलाओं और पारिवारिक सदस्यों के लिए समय एवं अवसर में सुधार देखा गया है।
नकारात्मक प्रभाव
- असमानता: भूमि-स्वामित्व, संसाधन-साधनों के आधार पर लाभ में अंतर।
- रोजगार का स्वरूप बदलना: मशीनरी के कारण पारंपरिक श्रम-मांग में कमी।
- किसानों पर ऋण-भार और उत्पादन-लागत का बोज़ बढ़ना। (स्रोतों में परिचालित)
- सामाजिक विस्थापन: कृषि-प्रविधि के बदलाव के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक सामुदायिक जीवन प्रभावित हुआ।
इस तरह, “हरित क्रांति क्या है” (Harit Kranti Kya Hai) के सवाल का उत्तर जितना तकनीकी और उत्पादन-उन्मुख है, उतना ही उसके सामाजिक-आर्थिक आयाम भी महत्वपूर्ण हैं।
पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय आयाम
हरित क्रांति (Harit Kranti Kya Hai) का पर्यावरण पर प्रभाव भी गहरा है। “हरित क्रांति क्या है” (Harit Kranti Kya Hai) के अंतर्गत यह हिस्सा उस भाग को दर्शाता है जहाँ हमें संतुलन बनाना होता है—कृषि-उत्पादन और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच।
- अधिकांश स्रोत बताते हैं कि रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, एवं भारी सिंचाई ने भूमि तथा पानी के संसाधनों पर दबाव डाला।
- जैव विविधता में कमी: पारंपरिक फसलों व स्थानीय किस्मों का स्थान सीमित हो गया।
- भूजल स्तर में गिरावट तथा भूमि क्षरण की समस्या उभरी (स्रोत संकेत नहीं सीधे लेकिन विषय-संबंधित)
- इसके प्रतिफलस्वरूप यह देखा गया कि अगली पीढ़ी की खेती-प्रणाली को और अधिक स्थायी व पर्यावरण-अनुकूल बनाना आवश्यक था।
इस तरह, “हरित क्रांति क्या है” (Harit Kranti Kya Hai) का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह एक तकनीकी क्रांति थी जिसने पर्यावरण-संबंधी प्रश्न भी खड़े कर दिए। इसलिए आज “दूसरी हरित क्रांति” या “हरित-संपोषित कृषि” की अवधारणा उभरी है।
“हरित क्रांति क्या है” — भारत-परिप्रेक्ष्य में आगे की दिशा
भारत में हरित क्रांति की शुरुआत ने कृषि-उत्पादन का रूप बदला, लेकिन आज समय आ गया है कि हम देखें आगे कैसे बढ़ना है। “हरित क्रांति क्या है” (Harit Kranti Kya Hai) को आज के संदर्भ में देखते हुए निम्न चुनौतियाँ एवं अवसर सामने हैं:
- दूसरी हरित क्रांति का महत्व: पहली क्रांति ने उत्पादन बढ़ाया, लेकिन गैर-खाद्य फसलों, दलहन-तिलहन, जैव-उर्वरक, एवं टिकाऊ कृषि-प्रणालियों को नहीं समाया।
- क्षेत्रीय संतुलन: पूर्वी एवं दक्षिणी भारत के शुष्क क्षेत्रों में भी हरित-प्रौद्योगिकी पहुँचाना आवश्यक है।
- पर्यावरण-अनुकूल कदम: आज उर्वरकों व कीटनाशकों का कम उपयोग, ड्रिप-सिंचाई, जैव-उर्वरक, संरक्षित खेती आदि को बढ़ावा देना “हरित क्रांति क्या है” के नए अर्थ हैं।
- किसान-शक्ति एवं लघु किसान-समर्थन: सिर्फ बड़े किसानों को नहीं, बल्कि हर किसान तक तकनीक, निवेश, बीज और बाजार-संवर्ह पहुंचना चाहिए।
- मल्टी-क्रॉपिंग व विविध फसल-प्रणाली: सिर्फ गेहूँ-चावल नहीं, बल्कि दलहन-तिलहन, फलों-सब्जियों और व्यावसायिक फसलों को भी प्रोत्साहन देना ज़रूरी है।
- प्रौद्योगिकी-प्रसार और डिजिटल कृषि: आज की डिजिटल युग में “हरित क्रांति क्या है” का उत्तर इसमें भी है कि कृषि में स्मार्ट-टेक, सटीक सिंचाई, मौसम-अनुमान, मोबाइल-प्रसार आदि को अपनाएं।
- भोजन-सुरक्षा एवं पोषण: उत्पादन बढ़ने के साथ यह सुनिश्चित करना है कि खाद्य पदार्थ पोषक हों, गुणवत्ता-उच्च हों।
निष्कर्ष
तो अंत में यह कहा जा सकता है कि “हरित क्रांति क्या है” (Harit Kranti Kya Hai) — यह सिर्फ एक कृषि-उपज बढ़ाने की पहल नहीं थी, बल्कि भारत के कृषि-परिदृश्य, किसान-जीवन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खाद्य-सुरक्षा तथा सामाजिक-परिवर्तन का इक्यूपैक्टेड रूप थी। इसके माध्यम से भारत ने खाद्य-संकट से निकलकर आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम उठाया।
लेकिन साथ ही यह भी याद रखना होगा कि हरित क्रांति एक अभियान के रूप में सीमित भी थी — उसकी चुनौतियाँ, असमानताएँ तथा पर्यावरणीय परिणाम थे। इसलिए आज जब हम “हरित क्रांति क्या है” (Harit Kranti Kya Hai) का अर्थ पुनः देख रहे हैं, तो हमें देखते समय यह भी सोचना होगा कि अगली पीढ़ी की “हरित क्रांति” कैसी होनी चाहिए — समावेशी, टिकाऊ, पर्यावरण-अनुकूल एवं समस्त किसान-समुदाय के लिए लाभदायक।
भारत में हरित क्रांति के प्रमुख व्यक्तित्व
हरित क्रांति के सफल क्रियान्वयन के पीछे कुछ महान वैज्ञानिक और नीति-निर्माता थे:
| व्यक्तित्व | योगदान |
|---|---|
| नॉर्मन ई. बोरलॉग | उच्च-उपज गेहूँ बीज विकसित कर “हरित क्रांति के जनक” कहलाए |
| डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन | भारत में HYV बीजों को अपनाने का नेतृत्व किया |
| चौधरी चरण सिंह | किसानों की नीतियों को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख नेता |
| सी. सुब्रमण्यम | तत्कालीन कृषि मंत्री, क्रांति की नीतियों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका |
हरित क्रांति से लाभान्वित प्रमुख क्षेत्र
हरित क्रांति समान रूप से पूरे भारत में सफल नहीं रही, परंतु कुछ राज्य इसके प्रमुख केंद्र रहे:
| राज्य/क्षेत्र | प्रमुख फसलें | विशेषताएँ |
|---|---|---|
| पंजाब | गेहूँ | अधिक सिंचाई, उर्वरता, मशीनरी उपयोग |
| हरियाणा | गेहूँ-चावल | उत्पादन वृद्धि और उच्च MSP लाभ |
| पश्चिमी उत्तर प्रदेश | गेहूँ-गन्ना | हाइब्रिड फसलें एवं कृषि-विस्तार |
इन क्षेत्रों में किसान आर्थिक रूप से मजबूत हुए, कृषि-संबंधित उद्योग भी विकसित हुए।
हरित क्रांति से उत्पन्न सामाजिक परिवर्तन
हरित क्रांति के कारण:
- ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, व्यापार, परिवहन में विकास हुआ
- किसान-समुदाय की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी
- महिलाओं की भूमिका खेती में अधिक महत्त्वपूर्ण होती गई
- किसान बाजार से अधिक जुड़े — अर्थात् कृषि व्यावसायिक होती गई
इन बिंदुओं से यह सिद्ध होता है कि यह केवल “अन्न-उत्पादन क्रांति” नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज की संरचना बदलने वाली क्रांति थी।
हरित क्रांति — उपलब्धियों और चुनौतियों का तुलनात्मक सार
| पक्ष | उपलब्धियाँ | चुनौतियाँ |
|---|---|---|
| उत्पादन | खाद्यान्न में तीव्र वृद्धि | पानी-मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट |
| किसान | कुछ किसानों की आय में वृद्धि | छोटी-जोती किसानों में असमानता |
| पर्यावरण | यांत्रिकीकरण व उत्पादकता | प्रदूषण, कीटनाशक-दूषण, जैव विविधता-क्षति |
| क्षेत्रीय विकास | पंजाब-हरियाणा में तीव्र प्रगति | पूर्वी भारत पिछड़ गया |
स्पष्ट है — अब संतुलन और स्थिर टिकाऊ विकास की आवश्यकता है।
आधुनिक दौर में हरित क्रांति का नया अर्थ
आज के संदर्भ में, सफल कृषि-क्रांति के लिए निम्न उपाय अपनाए जा रहे हैं:
- जैविक और प्राकृतिक खेती
- सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप, स्प्रिंकलर)
- कृषि-डिजिटलीकरण, स्मार्ट खेती
- दलहन-तिलहन स्वावलंबन पर ध्यान
- कृषि-उद्यमिता और स्टार्टअप्स
- किसानों को ई-नेम और आधुनिक बाजारों से जोड़ना
इन परिवर्तनों को ही आज “New Green Revolution” या “दूसरी हरित क्रांति” कहा जाता है।
परीक्षाओं के लिए महत्त्वपूर्ण तथ्य (One-Liner Notes)
- भारत में हरित क्रांति का आरंभ → 1960 का दशक
- मुख्य लक्ष्य → खाद्य-उत्पादन में तीव्र वृद्धि
- प्रमुख वैज्ञानिक → बोरलॉग, एम.एस. स्वामीनाथन
- सबसे अधिक लाभान्वित राज्य → पंजाब और हरियाणा
- प्रमुख फसलें → गेहूँ और चावल
- प्रमुख नकारात्मक प्रभाव → पर्यावरणीय हानि, क्षेत्रीय असमानता
FAQ : अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1. हरित क्रांति क्या है?
→ उच्च-उपज बीज, रासायनिक उर्वरक, सिंचाई और वैज्ञानिक खेती के माध्यम से कृषि-उत्पादन में लाए गए व्यापक सकारात्मक परिवर्तन को हरित क्रांति कहा जाता है।
Q2. भारत में हरित क्रांति कब शुरू हुई?
→ लगभग 1967–68 के बीच।
Q3. हरित क्रांति (Harit Kranti Kya Hai) का सबसे बड़ा लाभ क्या हुआ?
→ खाद्यान्न आत्मनिर्भरता और किसानों की आय में वृद्धि।
Q4. हरित क्रांति के पर्यावरण पर क्या दुष्प्रभाव पड़े?
→ मिट्टी-क्षरण, जल-प्रदूषण और कीटनाशक-दूषण।
Q5. दूसरी हरित क्रांति (Harit Kranti Kya Hai) की आवश्यकता क्यों है?
→ टिकाऊ, जैविक और समावेशी कृषि विकास सुनिश्चित करने के लिए।
संक्षिप्त निष्कर्ष
“हरित क्रांति क्या है?” (Harit Kranti Kya Hai) — इसका उत्तर केवल इतिहास नहीं, भविष्य भी है। जिस क्रांति ने भारत को भुखमरी से निकालकर खाद्य-आत्मनिर्भरता दी, आज उसी क्रांति को एक नए, पर्यावरण-अनुकूल और समावेशी रूप में आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
यह भारत की आर्थिक-सामाजिक प्रगति, किसानों की समृद्धि, और राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रमुख मार्ग है।